
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के दिवंगत जज, जस्टिस जे.एस. वर्मा द्वारा 1990 के दशक में दिए गए फैसले ‘हिंदुत्व जीने का तरीका’ को गलत बताते हुए कहा कि न्यायपालिका को, संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना की रक्षा करने के प्राथमिक कर्तव्य की अपनी दृष्टि नहीं खोनी चाहिए।मनमोहन सिंह ने कहा कि यह काम पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है, क्योंकि राजनीतिक विवादों और चुनावी लड़ाइयों को धार्मिक रंगों के साथ व्यापक रूप गलत किया जा रहा है।
उन्होंने न्यायमूर्ति वर्मा के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि इसने एक तरह से एक प्रकार की संवैधानिक पवित्रता को नुकसान पहुंचाया, जो बोम्मई फैसले के जरिए बहाल हुई थी, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी थी कि धर्मनिरपेक्षता, संविधान का एक बुनियादी ढांचा है। जस्टिस वर्मा के फैसले का गणराज्य में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों एवं प्रथाओं के बारे में राजनीतिक दलों के बीच जारी बहस पर एक निर्णायक असर पड़ा है।
उन्होंने कहा कि कोई भी संवैधानिक व्यवस्था सिर्फ न्यायपालिका द्वारा संरक्षित नहीं की जा सकती है। संविधान और इसकी धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्धताओं के संरक्षण की जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व, नागरिक समाज, धार्मिक नेताओं और प्रबुद्ध वर्ग की भी है।
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