Friday, September 28, 2018

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा पति महिला का स्वामी नहीं

अडल्टरी  क़ानून पर 1954 में पहली बार सवाल उठाया गया था । कानून के जानकारों का ये तर्क रहा है कि जब दो वयस्कों की मर्जी से कोई विवाहेतर संबंध स्थापित किए जाते हैं तो इसके परिणाम में महज़ एक पक्ष को ही सज़ा क्यों दी जाए ? यह 158 साल पूराना कानून है। आइपीसी की धारा 497 के तहत इस कानून को परिभाषित किया गया है। अगर कोई मर्द किसी दूसरी शादीशुदा महिला के साथ उसकी रजामंदी से शारीरिक संबंध बनाता है तो संबंध बनाने वाली महिला के पति की शिकायत पर संबंध बनाने वाले पुरुष को अडल्टरी क़ानून के अंतर्गत गुनहगार माना जाएगा। गुनाह साबित होने पर संबंध बनाने वाले पुरुष को पांच साल की कैद और जुर्माना या फ‍िर दाेनों ही सजा का प्रावधान है। लेकिन अगर कोई शादीशुदा मर्द किसी कुंवारी या विधवा औरत से शारीरिक संबंध बनाता है तो वह दोषी नहीं माना जाएगा।


advertisement:


अडल्टरी कानून पर 1954 और 2011 में दो बार इस मामले पर फ़ैसला भी सुनाया जा चुका है, जिसमें इस क़ानून को समानता के अधिकार का उल्लंघन करने वाला नहीं माना गया। पर अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि महिला की देह पर उसका अपना हक है, पति महिला का स्‍वामी नहीं है। यह उसका अधिकार है और उस पर किसी तरह की शर्तें या प्रतिबंध नहीं थोपा जा सकता है। पवित्रता का आशय सिर्फ़ महिलाओं के लिए नहीं है और ये समान रूप से पतियों यानी पुरुषों पर भी लागू होना चाहिए।

दिसंबर 2017 में इटली में रहने वाले एनआरआई जोसेफ़ शाइन ने एक जनहित याचिका दायर करते हुए अपील की थी कि आईपीसी की धारा 497 के तहत बने अडल्टरी क़ानून में पुरुष और महिला दोनों को ही बराबर सज़ा दी जानी चाहिए। इस याचिका के जवाब में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि ऐसा करने के लिए अडल्टरी क़ानून में बदलाव करने पर क़ानून हल्का हो जाएगा और समाज पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा।



from देश – Navyug Sandesh https://ift.tt/2OhN7CM

No comments:

Post a Comment