Friday, October 5, 2018

गरीबों को नवाजते हैं ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, इसलिए कहलाते हैं गरीब नवाज

अजमेर स्थित सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर रोज हजारों की तादाद में उनके अकीदतमंद (श्रद्धालु) तशरीफ लाते हैं। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के आस्ताने में (गर्भगृह) हजारों अकीदतमंद फूल और चादर पेश कर अपनी मन्नत और मुराद मांगते हैं। ख्वाजा मोइनुद्दीन को मानने वाले सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया में फैले हैं। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती किसी एक समाज और जाति के ना होकर हर जाति और समुदाय के बीच शांति और एकता के दूत के रूप में माने जाते हैं।


advertisement:


उनकी दरगाह में हर जाति समाज के लोग पहुंचते हैं और अपनी मन्नत के लिए दुआएं मांगते हैं। उनके आस्ताने के बाहर झरोखे (जाली) में मन्नत का धागा भी बांधते हैं। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को उनके चाहने वाले गरीब नवाज के नाम से भी पुकारते हैं, यानि गरीबों को नवाजने वाले (गरीबो को देने वाले) ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को उनके चाहने वाले गरीब नवाज के नाम से भी पुकारते हैं, यानि गरीबों को नवाजने वाले (गरीबो को देने वाले), ख्वाजा के अकीदतमंद उन पर पूरा यकीदा (यकीन, विश्वास) रखते हैं कि अगर ख्वाजा से मांगा है तो कभी खाली नहीं जाता और वह पूरा होकर रहता है।

ख्वाजा के दरवाजे अपने अकीदमंदों के लिए हमेशा खुले रहते हैं। सुबह के तीन बजे से ख्वाजा की दरगाह में उनके अकीदतमंदो का आना शुरू हो जाता है। जो दिन और रातभर चलता रहता है। फजर की नमाज के बाद से ही अकीदतमंदों का दरगाह में कुरआन पढऩे और तस्वीह पढऩे का सिलसिला शुरु हो जाता है। दिन निकलने के बाद कव्वाल ख्वाजा की शान में सूफीयाना अंदाज में कव्वालियों पढऩा शुरु करते हैं। सूफीयाना परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कव्वालों की कव्वालियां सुनकर वहां मौजूद अकीदतमंद ख्वाजा के रंग में रंग जाते हैं। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के चाहने वाले उनको ‘वली ए हिंद’ हिंद के राजा’ गरीब नवाज’ यानि गरीबों को नवाजने वाले जैसे नामों से भी पुकारते हैं।

मान्यता के अनुसार ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म ईरान में 536 हिजऱी संवत् अर्थात 1141 ई? पूर्व पर्शिया के सीस्तान में हुआ। रिवायतों (मान्यता के अनुसार) में कहा गया है कि ईरान के चश्त शहर से चिश्तिया शब्द निकला है। चिश्तिया जिसे (सूफी) तरीका भी कहा जाता है जिसकी शुरुआत अबू इसहाक ने की थी। लेकिन भारत में इस तरीके की शुरुआत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने की थी। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने भारत में आकर अजमेर को अपना कर्मस्थली बनाया। मोइनुद्दीन चिश्ती ने यहां से इस्लाम धर्म का प्रचार किया। ख्वाजा मोइनुद्दीन धर्म प्रचार के दौरान लोगों को बड़े शांतिपूर्वक तरीके से समझाते और उनके सूफी अंदाज से तो लोग खासे प्रभावित भी होते। धीरे-धीरे उनकी चर्चा दूर-दराज इलाकों में फैलती गई। जब वहां के राजाओं को इस बारे में पता चला तो उनका हटाने की कोशिश भी की गई और उनका विरोध भी हुआ। लेकिन उनके शांतिपूर्वक अंदाज और सूफी तरीके को वहां के राजाओं ने भी पसंद किया और उनको अपना काम करने दिया।

हर वर्ष ख्वाजा माइनुद्दीन चिश्ती का उर्स मनाया जाता है। जो पांच से सात दिन तक चलता है। झंडे की रस्म के साथ उर्स की शुरुआत हो जाती है। ख्वाजा के खिदमतगुजार चिश्तिया परिवार के लोग (खादिम)और गद्देनशीन इस पवित्र पर्व में हिस्सा लेते हैं।

इस्लामी माह रजब में ख्वाजा साहब का उर्स शुरु होता है। वैसे तो ख्वाजा साहब की दरगाह पर अजमेर नगरी में हजारों लागे रोज आते हैं। लेकिन उर्स के दौरान अजमेर में पैर रखने को जगह नहीं मिलती।

उर्स के दौरान भारत ही नहीं अपितु दुनिया के कोने-कोने से अकीदतमंद तशरीफ लाते हैं। सब अपनी मन्नत मुरादा पूरी होने की उम्मीद लेकर ख्वाजा की चौखट पर आते हैं। ख्वाजा के दरबार की सबसे खास बात यह है कि वहां हर जाति-समुदाय इंसान हक से आता है और अपनी मुराद पूरी होने की दुआ मांगता है।

हिंदुस्तान के हर राज्य से लोग आते हैं। इसके अलावा हर नेता-अभिनेता वहां आकर अपनी कामयाबी की दुआ मांगता है। भारत के हर राज्य की सरकार चादर पेश कर अपनी अर्जी लगाती है। वहां राज्य हो या केंद्र सरकार सभी चादर और अकीदत के फूल ख्वाजा के दरबार में पेश करते हैं।

भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति हर साल ख्वाजा साहब के दरबार में चादर पेश करते हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री की तरफ से चादर हर साल पेश की जाती है। बॉलीवुड का कोई अभिनेता,अभिनेत्री या फिल्म प्रोड्यूसर या डायरेक्टर हो वहां आकर अपनी कामयाबी की दुआ मांगना नहीं भूलता। पड़ौसी देश पाकिस्तान की सरकार की तरफ से ख्वाजा साहब की दरगाह में हर साल चादर पेश की जाती है। इसके अलावा पाकिस्तान से ख्वाजा के अकीदतमंदों का जत्था भी हर साल आता है। जिसकी इजाजत भारत सरकार बेरोकटोक देती है।



from देश – Navyug Sandesh https://ift.tt/2pAvhNh

No comments:

Post a Comment