
विश्वामित्र राम व लक्ष्मण को साथ लेकर यज्ञ-मण्डप में पधारे । ऋषिवर विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को राजा जनक के पास ले गए और उनसे बोले–राजन्! ये दोनों आपके सुनाभ नामक धनुष के विषय में कुछ जानना चहते हैं और उसे देखने की इच्छा करते हैं ।
जनक प्रसन्न होकर बोले–मुनिवर! सुनाभ शिव जी का धनुष है । मेरे पूर्वजों ने उसको देवताओं से पाया था । उस भारी धनुष पर अब तक कोई भी प्रत्यञ्चा नही चढ़ा सकता है । मैंने यह प्रण किया है कि जो वीर पुरुष शिव-धनुष को उठाकर उसपर डोरी चढ़ा देगा| उसी के साथ मैं अपनी पुत्री सीता का विवाह करूंगा ।
राम भी सीता के स्वयंबर में शामिल हुए| सभी ने अपने –अपने प्रयास किये धनुष को उठाने के लेकिन कोई भी उस धनुष को न उठा सका|
तभी राजा जनक क्रोधित हो पूरी सभा को सम्भोधित कर कहा- क्या वीरों की यह भूमी वीरों से हीन हो गई है? कोई भी वीर-शूरवीर नही जो इस धनुष पर डोर चड़ा सके? क्या सीता के योग्य इस धरती पर कोई योग्य वीर-वर नही ?
इतनी नपुसंकता भरी बातें सुन लक्ष्मण क्रोध से बोले- आपने हम सूर्यवंशियो के समक्ष इतनी कायरता पूर्ण बातें करने का साहस कैसे किया? हम सूर्यवंशी है | हमारे लिए यह एक मात्र क्रीड़ा है|
लक्ष्मण से भगवान राम से प्रार्थना की |राम ने खेल-खेल में ही धनुष पर डोर तान दी| राम की जय-जय कार सर्व दिशायों में होने लगी|
राजा जनक का हृदय हर्ष से उछल पड़ा । वे विश्वामित्र से बोले–मुनीन्द्र! यदि आप स्वीकृति दें तो मैं आज ही महाराजा दशरथ के पास राम-सीता के विवाह का प्रस्ताव भेज दूं ।
विश्वामित्र की अनुमति से राजा जनक ने दशरथ को आमंत्रण का प्रस्ताव भेजा
मन्त्रिगण में राजा दशरथ को जनक का प्रस्ताव दिया और राम-लक्ष्मण का कुशल समाचार बताया ।
राजा ने मन्त्रियों, पुरोहितों से परामर्श करके जनक के प्रस्ताव को स्वीकार किया । विवाह का शुभ योग में राजा दशरथ ने अपनी प्रजा व रानियों सहित मिथिला को प्रस्थान किया ।
विश्वामित्र की प्रेरणा से जनक ने लक्ष्मण के साथ अपनी दूसरी कन्या उर्मिला के विवाह की चर्चा चलाई । दशरथ ने इसे स्वीकार कर लिया । उसी अवसर पर विश्वामित्र ने भरत-शत्रुघ्न के साथ जनक के भाई राजा कुशध्वज की दो कन्याओं के विवाह का भी प्रस्ताव किया । दोनों पक्ष वालों ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया चारों राजकुमारों का विवाह करना निश्चित हो गया ।
विवाह के दिन जनक की महापुरी उत्सवमयी हो गई । पूरी मिथिला दुल्हन की तरह सजाई गई|
घर-घर, द्वार-द्वार और एक-एक मार्ग तोरण-बन्दनवारों से सजाया गया । चारों ओर मंगलगीतों गूंजने लगे । । शुभ मुहूर्त में अयोध्या के चारों राजकुमार विवाह-मण्डप में पधारे, दूसरी ओर से मिथिला की सुन्दरी सीता सहित राजकन्यायें आईं । विधि-विधान से सभी मंगल कार्य सम्पन्न किए गए ।
जनक ने अग्नि के समक्ष सीता को राम के हाथों में सौंपते हुए कहा–राम! आज से मेरी यह प्रिय पुत्री सीता तुम्हारी है । छाया की भांति सदा-सर्वदा तुम्हारी सहगामिनी बनकर तुम्हारे साथ रहेगी । तुम इसका पाणिग्रहण करो! इसी प्रकार अन्य तीनों का भी पाणिग्रहण कराया गया ।
विवाह के दूसरे दिन विश्वामित्र सहित रजा दशरथ सबसे विदा लेकर मिथिला से चले गए ।
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