
प्राचीन काल से तांबे से बने बर्तनों का प्रयोग बहुत ही पवित्र रूप से किया जा रहा है। अगर आपने कभी ध्यान दिया हो तो किसी भी पूजा व हवन और भगवान की आराधना में जिन बर्तनों का हम प्रयोग करते हैं वह सिर्फ तांबे के ही बने होते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है, वही चीजें हजारों साल पहले ही वेदों में भी खोज ली गई थीं। जिस पृथ्वी ग्रह पर हम रह रहे हैं, उसके अलावा भी ब्रहृांड में बहुत सारे ग्रह मौजूद हैं जिनका उल्लेख वर्षो पहले महान ऋषि-मुनियों द्वारा अपनी रचनाओं में किया गया था।
बैक्टीरिया यानी की कीटाणुओं का हमारे आसपास मौजूद हाने का दावा आयुर्वेद द्वारा आधुनिक विज्ञान से बहुत पहले ही अपनी रचनाओं में किया गया था। इस बात को साबित करने का सबसे पहला उदाहरण है आयुर्वेद द्वारा तांबे के बर्तन में पानी पीने का महत्व। मनुष्य के स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण समझते हुए आयुर्वेद ने तांबे के बर्तन में ही पानी पीने की सलाह दी है।
आयुर्वेद का यह मानना है कि पानी में विभिन्न प्रकार के कीटाणु होते हैं जो तांबे से बने हुए बर्तन में पानी को डालने से मर जाते हैं। यही खोज सालों बाद विज्ञान द्वारा भी की गई थी। पानी की अपनी स्मरण-शक्ति होने के कारण हम इस बात पर ध्यान देते हैं हें कि उसको कैसे बर्तन में रखें। अगर आप पानी को रात भर या कम-से-कम चार घंटे तक तांबे के बर्तन में रखें तो यह तांबे के कुछ गुण अपने में समा लेता है।
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