
पिता-पुत्र का रिश्ता थोड़ा फासले वाला होता है। कहा जाता है कि पिता के ज्यादा करीब बेटियां होती हैं, जबकि बेटों से पिता का रिश्ता ऊपर से कड़वा ओर कडक़ और जबकि अंदर से पिता अपने बेटों से बहुत प्यार करते हैं, लेकिन, वह ऊपरी तौर पर बेटों से कडक़ ओर रुखे रहते हैं, ताकि पिता के प्यार से बेटे लापरवाह होकर बिगड़ ना जाएं। कहा जाता है, जब पिता की जूती बेटे के पैरो में आने लगे तो पिता-पुत्र का रिश्ता दोस्त का हो जाता है। कहा जाता है कि बेटे के करियर, शिक्षा की फिक्र सबसे ज्यादा उसके पिता को ही होती है। पिता-पुत्र के रिश्तों पर कई उपन्यास भी लिखे जा चुके हैं और फिल्में भी बन चुकी हैं।
फिल्मों में भी दिखाया गया है कि कैसे बेटे अपने पिता से खौफ खाते हैं, पिता के सामने आने पर डरते हैं।
लेकिन, पिता-पुत्र से बढक़र कोई और दोस्ताना रिश्ता नहीं हो सकता।
पिता अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपनी जवानी, खुशी, और अरमानों को दबाकर दिन रात कमाता है ओर बच्चों को पढ़ाता है, ताकि बच्चें किसी काबिल बन जाएं।
पिता अपनी जिंदगी की सारी दौलत, सारी कमाई बच्चों को किसी काबिल बनाने में लगा देता है।
पिता खुद बसों में धक्के खाता है लेकिन, बेटे और बेटियों को स्कूटर ओर मोटरसाइकिल दिलवाता है।
पिता बच्चों की पढ़ाई के साथ साथ बच्चों की शादी के लिए भी सेविंग करता है।
पिता अपने बेटों गलत दिशा में जाने से रोकता है, जबकि बेटियों को बुरी छाया पडऩे से बचाता है।
पिता बच्चों को भविष्य का ऐसा पुल होता है जिस पर चलकर बच्चे बड़ी से बड़ी कठिनाईयां पार कर जाते हैं।
इसलिए तो बेटियां अपने पिता को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा हीरो मानती हैं, अपना सबकुछ बच्चों पर कुर्बान करने वाले पिता हर बच्चों के लिए आइडियल और आदर्श होते हैं, ओर उनकी जिंदगी के सबसे बड़े हीरो होते हैं।
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