
कोसल देश के शासक राजा दशरथ बड़े ठाट से सुयोग्य मन्त्रियों व ऋषि-मुनियों की सहायता से धर्मनुसार राजकाज चलाते थे ।
राजा दशरथ को सभी सुख होते हुए भी उन्हें जो सुख नही था, वह था संतान का । उन्हें किसी वस्तु की कमी नहीं थी, फिर भी राजा को अपना जीवन फीका लगता था।
राजा दशरथ के तीन रानियां थीं। कौशल्या सबसे बड़ी रानी, कैकयी मजली रानी, सुमित्रा सबसे छोटी रानी थी। लेकिन तीनों में से एक के भी कोई संतान नहीं थी ।
एक दिन राजा ने इस विषय में अपने मन्त्रियों और धर्मगुरुओं व ऋषि-मुनियों से परामर्श किया । सबने पुत्र-प्राप्ति के लिए यज्ञ करने की सलाह दी । तब श्रृंग ऋषि को यज्ञ का प्रस्ताव भेज गया । राजा ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया ।
ऋष्यश्रृंग ने अथर्ववेद के अनुसार पुत्रेष्टि-यज्ञ किया ।
राजा दशरथ ने जब अन्तिम आहुति डाली, तब अग्निदेव स्वयं एक स्वर्णपात्र में खीर लेकर उनके सामने प्रकट हो गए ।
राजा ने उसमें से आधी खीर अपनी ज्येष्ठ रानी कौशल्या को दी, आधा भाग दूसरी रानी कैकयी को दिया और बचे हुए हिस्से में से दो भाग करके छोटी रानी सुमित्रा को दिया।
यज्ञ के बारहवें महीने में चान्द्रमास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से दिव्य राम का जन्म हुआ । कैकेयी के गर्भ से भरत और सुमित्रा के गर्भ से लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न पैदा हुए ।
चारों कुमार जन्म से ही अत्यन्त तेजस्वी थे । दशरथ का सूना घर खुशियों से भर गया ।
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