Sunday, October 6, 2019

इस प्रकार राजा राम ने किया था तड़का का वध

अयोध्या के राजा के  चारों कुमार राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न सुशिक्षित और नवयुवक हुए। तभी महार्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के भवन में आये और प्रसन्न होकर बोले–राजन्! हम एक विशेष प्रयोजन से आपके पास आए ।

 

हम सभी ऋषिगण वैज्ञानिक गतिविधियों को पूर्ण करने के लिए हवन कर रहे है। लेकिन महाबली मारीच और सुबाहु–बार-बार उसमें विघ्न डाल देते हैं । उस यज्ञ की रक्षा के लिए हम आपके वीर पुत्र राम को अपने साथ ले जाना चाहते हैं ।  कृपया उन्हें आज ही मेरे साथ चलने की आज्ञा दे।

इतना सुनते ही राजा घबरा गए । ऋषिराज! यह क्या कह रहे है आप? बड़े-बलवानों जिनसे देवता भी डरते है।,  उनसे कौन युद्ध करेगा?  मेरा राम अभी बालक है, उन राक्षसों से लड़ने की क्षमता उसमें नही है। मैं स्वयं चतुरंगिणी सेना लेकर आपके साथ चलूंगा और आपके यज्ञ की रक्षा मैं करूंगा । कृपा करके मेरे प्राणप्यारे राम को न ले जाए। मैं नही जी पाऊंगा उसके बिना।

 

विश्वामित्र ने क्रुद्ध होकर कहा–राजा दशरथ, आपका यह आचरण नीति विरुद्ध है । आप अपने वचन का पालन नहीं करना चाहते और न ही आप रघुवंशी जैसे ही वार्ता कर रहे हो । अगर राम नही दे सकते तो मेरा यहाँ क्या काम? अब मैं यहां से जाता हूं|

 

 

तब राजगुरु वसिष्ठ ने दशरथ को समझाते हुए कहा–महाराज! आप महर्षि विश्वामित्र को वचन दे दिया है।  महर्षि विश्वामित्र ने कुछ सोच-समझकर ही राम को अपने साथ ले जाने की इच्छा जताई है। इसके पीछे का प्रयोजन सिर्फ ऋषि ही जाने।

 

वशिष्ठ के कहने से दशरथ ने राम को विश्वामित्र के हाथों में सौंप दिया । लक्ष्मण भी स्वेच्छा से बड़े भाई के साथ जाने को तैयार हो गए ।

 

गुरु-जनों के आशीर्वाद लेकर राम, लक्षमण दोनों धनुष-बाण सहित विश्वामित्र के साथ चल पड़े ।

विश्वामित्र ने राम को बला-अतिबला नामक योग की दो गुप्त विद्याएं दी जिनसे वह अपनी आसुरी शक्तियों के आक्रमण से सुरक्षित रहोगे ।

 

 

राम ने तुरन्त  महर्षि से उन विद्याओं को विधिवत् ग्रहण किया ।

इसके पश्चात विश्वामित्र ने कहा– राम!  ताड़का नाम की एक दुष्टा राक्षसी ने अपने ऊधमी पुत्र मारीच की सहायता से दोनों बसे-बसाए गांव  को उजाड़ दिया ।  तुम  इस स्थान का पुनरुद्धार करो ।

 

ताड़का का वध आज ही होना तय है। तुम आज ही तड़का का वध करो। राम ने उत्तर दिया–आर्य! मैं ताड़का को आज ही मारूँगा।

 

ऐसा कहकर उन्होंने धनुष की डोर खींची । राक्षसी ताड़का उसे सुनकर गरजती हुई दौड़ी । वह राम पर पत्थरों की वर्षा करने लगी । राम ने बाणों से पत्थरों को टुकड़ो में बदल दिया । वह अपनी दीर्घ भुजाओं को फैलाकर राम की ओर आंधी की तरह झपटी ।

 

राम ने उसे बाणों से आहत कर दिया । वह पत्थर बरसाने लगी । बाणों से घिरी ताड़का राम पर टूट पड़ी । राम ने उसकी छाती पर बाण मारा कि वह दर्द से करहाती हुई मर गई । विश्वामित्र ने राम को गले से लगा कर शौर्य की प्रशंशा की ।

 



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